न्यूज़पेपर, मैगज़ीन का कनेक्शन

यह लेख न्यूजवीक मैगज़ीन का प्रकाशन बन्द होने के पहले लिखा था, आजकल हम सभी ज्यादा वक़्त इन्टरनेट को देते है, उसी से सम्बन्धित है यह लेख और इस कंटेन्ट की लैंग्वेज़ बाइलिंग्वल है क्योकि बाइलिंग्वल न्यूज़पेपर के लिये लिखा था…
आर्थिक मंदी के इस दौर में जहां लगभग सारे उद्योग धन्धों पर सा संकट आ गया है तो अखबार उद्योग इससे अछूता क्यों रहे अजीब बात है कि जिस इंटरनेट को इनफार्मेशन एज का ओरिजिनेटर कहा जाता है। उसी इंटरनेट के आने के बाद सूचना के सबसे अच्छे सोर्स समाचार पत्रों का प्रकाशन बन्द हो रहा है। इंटरनेट के आने से क्या लोगों के बीच समाचारों की जरूरत ही समाप्त हो गयी है या केवल न्यूज़ डिस्ट्रीब्यूशन का तरीका बदल गया है। कागज के बने हुए लिफाफे व पेपरबैग्स की जगह जब पॅालीबैग्स ने ली तो ऐसा तो नही हुआ कि पेपरबैग्स बनना बन्द हो गए।
यहां पर पेपरबैग या पॅालीथिन के उद्योग की मुख्य बात नही बल्कि एक समाचार मुख्य है कि अमेरिका की 80 साल पुरानी मैगज़ीन न्यूजवीक का प्रकाशन बंद हो रहा है अब ये पत्रिका वेवसाइट के जरिए सिर्फ ऑनलाइन ही पढ़ी जा सकेगी। इस मैगज़ीन का आखिरी प्रिंट एडिशन 31 दिसंबर को आएगा जिसमें न्यूज़पेपर व मैगज़ीन के ऑनलाइन एडिशन की तरफ बढ़ने के रुझान की चर्चा होगी क्योंकि ट्रैडिशनल एडवरटीज़मेन्ट से होने वाली उनकी आय घट रही है। न्यूज़वीक टाइम्स के बाद अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी मैगज़ीन रही है लेकिन पाठकों की घटती संख्या और एडवरटीज़मेन्ट्स से होने वाली आय में कमी के कारण न्यूजवीक को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अपने ऑनलाइन एडिशन के जरिए न्यूज़वीक उन 7 करोड़ अमेरिकन्स को अपना लक्ष्य मान रही है जो टेबलेट कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं। 2010 से ही अमेरिका में आनलाइन सोर्सेज़ से समाचार प्राप्त करने वालों की संख्या अखबार पढ़नेवालों से ज्यादा हो चुकी थी लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इस बाजार में और भी कई खिलाड़ी हैं इसलिए डिजिटल दुनिया में टिकना इतना आसान नहीं होगा।
शायद अखबार अपनी बुनियादी भूमिका बदलना चाहता है कि उनका बेसिक पर्पज़ अखबारी कागज़ पर छपी सूचनाओं के पन्नों को सारे इलाके में वितरित करवाना नही बल्कि इन्फार्म ही करना है चाहे वह डिजिटलाइज़ ही हो इसीलिए शायद अब इस व्यवस्था को बदलने का समय आ गया।
परन्तु यह ध्यान देने वाली बात है कि वेब पर केवल वही समाचार पत्र अपने कन्टेन्ट के लिए पैसा ले पा रहे हैं जिनकी साख और ब्रांड वैल्यू विश्व में बहुत अच्छी है रियल चैलेंज तो उन समाचार पत्रों के लिए है जिनकी अपनी कोई विशिष्ट पहचान नहीं है। खास कर जब वेब पर मुफ्त समाचार बांटने के लिए अनलिमिटेड वेबसाइट्स हैं। वेब से आगे बढ़ कर अनेक अखबारों ने टैबलेट, स्मार्ट फोन, सोशल मीडिया पर अपने लिए बाजार बना लिया है। अनेक अखबारों ने वेब के चंगुल से निकलने के लिए इन नये उपकरणों आविष्कारों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है।
आज इंटरनेट पर फ्रीलान्सर जर्नलिस्ट्स, ब्लागर्स की बड़ी संख्या है जो लोगों के सामने अपने विचार रखने के लिए अखबारों पर निर्भर नहीं हैं। एक अमेरिकी जर्नलिस्ट के अनुसार फ्रीडम आॅफ प्रेस उनके लिए है जिनका अपना प्रेस है आज इंटरनेट के आने के बाद हर कंप्यूटर एक प्रिंटिंग प्रेस है।
फिर भी अखबारों की इतनी दुर्दशा के बाद आज भी अधिकतर लोग वेब पर भी न्यूज़ के लिए अखबारों को ही देखते हैं तो क्या विशुद्ध पत्रकारिता के बल पर समाचारपत्र आगे भी बने रहेंगे।
कागज पर छपा समाचारपत्र एक पैकेज या बंडल की तरह है जिसमें न्यूज़, व्यूज़, साइंस, नालेज, स्पोटर्स, बिज़नेस सारे पार्ट्स एक साथ होते हैं। इंटरनेट ने इस बंडल को खोल दिया है और विभिन्न टुकड़ों को रीडर्स के इन्टरेस्ट के अकार्डिंग कैटेगराइज़ कर दिया है। यहां तक कि एडवरटीज़मेन्ट्स को भी रेफरेन्स के अकार्डिंग लगाया है। नेट पर अखबारो की डिस्ट्रीब्यूशन वैल्यू भी ज़ीरो है। अब प्रिंट एडिशन के अखबारी बंडल का लाभ के साथ चल पाना मुश्किल है।
अब तो यही कह सकते है कि ये प्रिटिंग प्रेस गुजरे जमाने की चीज़ होने वाली है क्योकि ये रैग्यूलयरली प्रिंट करने वाले डेली लिट्रेचर मतलब समाचार पत्र को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षण का एक माध्यम बने हुए थे। इससे ऐेतिहासिक दस्तावेज़ो में कमी आयेगी। आज हमें राष्ट्रीय अभिलेखागार और राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन में एतिहासिक शिलालेख, पाण्डुलिपियां तो मिल जाती हैं पर आगे नही मिल पायेंगी, आज चाहे जितनी तरक्की इन्टरनेट ने कर ली हो लेकिन उस पर मौजूद ज्ञान की विश्वसनीयता उतनी नही है। इस बात को समझने के लिए यह काफी है कि इन्टरनेट पर उपलब्ध विश्व का सबसे बड़ा एनसाइक्लोपीडिया विकीपीडिया को कोई भी एडिट कर सकता है, जिसको प्रामाणित करने में इन्टरनेट सक्षम नहीं है।
बस थोड़ा सा अभी इसमे एडिट किया है-ये सब होने के बावजूद भी दिल में खुशी होती है क्योकि अभी तक हमें एक ही मासिक पत्रिका का नाम पता था जो विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होती है, और वो भी बिना किसी विज्ञापन के, जिस पर शोध भी किया जा चुका है कि इस समय में, जब की किसी मैगज़ीन या अखबार को चलाने के लिये विज्ञापन अहम् भूमिका रखता है, वो भी इतनी बड़ी संख्या में रीडरशिप का होना मायने रखता है।
कुछ समय पहले एक अखबार भी ऐसी ही नीतियो को लेकर छपना प्रारम्भ हुआ है जिसमें विज्ञापन प्रकाशित नही होते और बड़े-बड़े जर्नलिस्ट्स के लेख उस अखबार में छपते हैं, आशा है कि इस अखबार की भी रीडरशिप बड़ी संख्या में बढ़े।

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