न्यूज़पेपर, मैगज़ीन का कनेक्शन

यह लेख न्यूजवीक मैगज़ीन का प्रकाशन बन्द होने के पहले लिखा था, आजकल हम सभी ज्यादा वक़्त इन्टरनेट को देते है, उसी से सम्बन्धित है यह लेख और इस कंटेन्ट की लैंग्वेज़ बाइलिंग्वल है क्योकि बाइलिंग्वल न्यूज़पेपर के लिये लिखा था…
आर्थिक मंदी के इस दौर में जहां लगभग सारे उद्योग धन्धों पर सा संकट आ गया है तो अखबार उद्योग इससे अछूता क्यों रहे अजीब बात है कि जिस इंटरनेट को इनफार्मेशन एज का ओरिजिनेटर कहा जाता है। उसी इंटरनेट के आने के बाद सूचना के सबसे अच्छे सोर्स समाचार पत्रों का प्रकाशन बन्द हो रहा है। इंटरनेट के आने से क्या लोगों के बीच समाचारों की जरूरत ही समाप्त हो गयी है या केवल न्यूज़ डिस्ट्रीब्यूशन का तरीका बदल गया है। कागज के बने हुए लिफाफे व पेपरबैग्स की जगह जब पॅालीबैग्स ने ली तो ऐसा तो नही हुआ कि पेपरबैग्स बनना बन्द हो गए।
यहां पर पेपरबैग या पॅालीथिन के उद्योग की मुख्य बात नही बल्कि एक समाचार मुख्य है कि अमेरिका की 80 साल पुरानी मैगज़ीन न्यूजवीक का प्रकाशन बंद हो रहा है अब ये पत्रिका वेवसाइट के जरिए सिर्फ ऑनलाइन ही पढ़ी जा सकेगी। इस मैगज़ीन का आखिरी प्रिंट एडिशन 31 दिसंबर को आएगा जिसमें न्यूज़पेपर व मैगज़ीन के ऑनलाइन एडिशन की तरफ बढ़ने के रुझान की चर्चा होगी क्योंकि ट्रैडिशनल एडवरटीज़मेन्ट से होने वाली उनकी आय घट रही है। न्यूज़वीक टाइम्स के बाद अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी मैगज़ीन रही है लेकिन पाठकों की घटती संख्या और एडवरटीज़मेन्ट्स से होने वाली आय में कमी के कारण न्यूजवीक को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अपने ऑनलाइन एडिशन के जरिए न्यूज़वीक उन 7 करोड़ अमेरिकन्स को अपना लक्ष्य मान रही है जो टेबलेट कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं। 2010 से ही अमेरिका में आनलाइन सोर्सेज़ से समाचार प्राप्त करने वालों की संख्या अखबार पढ़नेवालों से ज्यादा हो चुकी थी लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इस बाजार में और भी कई खिलाड़ी हैं इसलिए डिजिटल दुनिया में टिकना इतना आसान नहीं होगा।
शायद अखबार अपनी बुनियादी भूमिका बदलना चाहता है कि उनका बेसिक पर्पज़ अखबारी कागज़ पर छपी सूचनाओं के पन्नों को सारे इलाके में वितरित करवाना नही बल्कि इन्फार्म ही करना है चाहे वह डिजिटलाइज़ ही हो इसीलिए शायद अब इस व्यवस्था को बदलने का समय आ गया।
परन्तु यह ध्यान देने वाली बात है कि वेब पर केवल वही समाचार पत्र अपने कन्टेन्ट के लिए पैसा ले पा रहे हैं जिनकी साख और ब्रांड वैल्यू विश्व में बहुत अच्छी है रियल चैलेंज तो उन समाचार पत्रों के लिए है जिनकी अपनी कोई विशिष्ट पहचान नहीं है। खास कर जब वेब पर मुफ्त समाचार बांटने के लिए अनलिमिटेड वेबसाइट्स हैं। वेब से आगे बढ़ कर अनेक अखबारों ने टैबलेट, स्मार्ट फोन, सोशल मीडिया पर अपने लिए बाजार बना लिया है। अनेक अखबारों ने वेब के चंगुल से निकलने के लिए इन नये उपकरणों आविष्कारों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है।
आज इंटरनेट पर फ्रीलान्सर जर्नलिस्ट्स, ब्लागर्स की बड़ी संख्या है जो लोगों के सामने अपने विचार रखने के लिए अखबारों पर निर्भर नहीं हैं। एक अमेरिकी जर्नलिस्ट के अनुसार फ्रीडम आॅफ प्रेस उनके लिए है जिनका अपना प्रेस है आज इंटरनेट के आने के बाद हर कंप्यूटर एक प्रिंटिंग प्रेस है।
फिर भी अखबारों की इतनी दुर्दशा के बाद आज भी अधिकतर लोग वेब पर भी न्यूज़ के लिए अखबारों को ही देखते हैं तो क्या विशुद्ध पत्रकारिता के बल पर समाचारपत्र आगे भी बने रहेंगे।
कागज पर छपा समाचारपत्र एक पैकेज या बंडल की तरह है जिसमें न्यूज़, व्यूज़, साइंस, नालेज, स्पोटर्स, बिज़नेस सारे पार्ट्स एक साथ होते हैं। इंटरनेट ने इस बंडल को खोल दिया है और विभिन्न टुकड़ों को रीडर्स के इन्टरेस्ट के अकार्डिंग कैटेगराइज़ कर दिया है। यहां तक कि एडवरटीज़मेन्ट्स को भी रेफरेन्स के अकार्डिंग लगाया है। नेट पर अखबारो की डिस्ट्रीब्यूशन वैल्यू भी ज़ीरो है। अब प्रिंट एडिशन के अखबारी बंडल का लाभ के साथ चल पाना मुश्किल है।
अब तो यही कह सकते है कि ये प्रिटिंग प्रेस गुजरे जमाने की चीज़ होने वाली है क्योकि ये रैग्यूलयरली प्रिंट करने वाले डेली लिट्रेचर मतलब समाचार पत्र को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षण का एक माध्यम बने हुए थे। इससे ऐेतिहासिक दस्तावेज़ो में कमी आयेगी। आज हमें राष्ट्रीय अभिलेखागार और राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन में एतिहासिक शिलालेख, पाण्डुलिपियां तो मिल जाती हैं पर आगे नही मिल पायेंगी, आज चाहे जितनी तरक्की इन्टरनेट ने कर ली हो लेकिन उस पर मौजूद ज्ञान की विश्वसनीयता उतनी नही है। इस बात को समझने के लिए यह काफी है कि इन्टरनेट पर उपलब्ध विश्व का सबसे बड़ा एनसाइक्लोपीडिया विकीपीडिया को कोई भी एडिट कर सकता है, जिसको प्रामाणित करने में इन्टरनेट सक्षम नहीं है।
बस थोड़ा सा अभी इसमे एडिट किया है-ये सब होने के बावजूद भी दिल में खुशी होती है क्योकि अभी तक हमें एक ही मासिक पत्रिका का नाम पता था जो विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होती है, और वो भी बिना किसी विज्ञापन के, जिस पर शोध भी किया जा चुका है कि इस समय में, जब की किसी मैगज़ीन या अखबार को चलाने के लिये विज्ञापन अहम् भूमिका रखता है, वो भी इतनी बड़ी संख्या में रीडरशिप का होना मायने रखता है।
कुछ समय पहले एक अखबार भी ऐसी ही नीतियो को लेकर छपना प्रारम्भ हुआ है जिसमें विज्ञापन प्रकाशित नही होते और बड़े-बड़े जर्नलिस्ट्स के लेख उस अखबार में छपते हैं, आशा है कि इस अखबार की भी रीडरशिप बड़ी संख्या में बढ़े।

गो ग्रीन…

 

गेहूं के खेतो में कंघी जो करे हवाऐ वाला गाना गाऊं या तरन आदर्श की तरह बताऊ की इस वर्ष की सबसे ज्यादा कमायी करने वाली फिल्म अनियन एक्सप्रेस रही क्योकि इस फिल्म ने चेन्नई एक्सप्रेस को भी पीछे छोड़ दिया । ज्यादा नही लिखूंगी, बस इतना कहूंगी कि खेत, किसान, अनाज, वर्तमान सरकार के वायदे व घोषणा, बजट, किसानो की आत्महत्या को रोकने के उपाय जैसे आयामों को लेकर लिखा हुआ यह निबन्ध सफलता पत्रिका में पुरस्कृत निबन्ध की श्रेणी में प्रकाशित हो चुका है जिसके लिये मैं इस पत्रिका की आभारी हूं और क्योकि यह निबन्ध है, तो थोड़ा ज़्यादा समय मांगता है, पढ़ने के लिये कुछ समय हो तो वक्त दिया जा सकता है-

 

दूसरी हरित क्रान्ति

वर्तमान समय में आबादी वृद्धि, औद्योगिकीकरण व अन्य कारणों से घटती जमीन आर्थिक विकास तथा अन्तर्राष्ट्रीय चुनौतियों के कारण भारत की कृषि जबर्दश्त दबाब से गुजर रही है। सरकार की चिंता है कि देश में अनाज की सुनिश्चितता हो, फूड सेक्यूरिटी और वह इसके लिए नया बिल ला रही है! बिल लाने से अगर देश की समस्याओं का समाधान होता तो इस देश में आज कोई समस्या बचती ही नहीं क्योंकि हमारी सरकारों ने बिल लाने में कभी कोई कमी की ही नहीं है। बिल आते हैं और बिलों में समा जाते हैं। हमारे लोकतंत्र का यह सबसे बड़ा संकट है क्योंकि इस लोकतंत्र में बिल-ही-बिल हैं। उन्हें अनाज की सुनिश्चितता की चिंता है, जबकि हमें चिंता भूख की होनी चाहिए। भूख बहुत खतरनाक होती है क्योंकि यह पेट से उठती है और दिमाग तक पहुंच जाती है। भूख ने महल बनाये हैं और महल गिराये हैं। आज सारे अरब देशों में जो आंधी उठी हुई है वह पेट की भूख से लेकर दिमाग की भूख तक का ही परिणाम है। भूख से सभी डरते हैं । भूखा भी और जिसका पेट भरा है, वह भी। हरित क्रांति से भूख की समस्या हल करने का ख्वाब आज देखा जा रहा है।

दूसरी हरित क्रान्ति की आवश्यकता-

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि देश में वर्ष 2010-11 में अन्न का रेकॉर्ड 241 मिलियन टन उत्पादन हुआ लेकिन भविष्य में अन्न की बढती मांग देखते हुए दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है। उन्होनें यह भी कहा कि 2020-21 तक भारत को 281 मिलियन टन अनाज की जरूरत होगी और इसके लिए भारत को कृषि क्षेत्र में उत्पादन को दो फीसदी प्रतिवर्ष के हिसाब से और बढ़ाना होगा। इसके साथ ही पिछले वर्ष बिहार कृषि रोड मैप का शुभारंभ करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि कृषि के क्षेत्र में विकास जरूरी है, जिसके लिए दूसरी हरित क्रांति की आवश्यकता है।

देश की खाद्यान्न उत्पादकता को बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार ने दो साल पहले पूर्वी भारत में ब्रिंगिंग ग्रीन रिवोल्यूशन इन ईस्टर्न इंडिया बीजीआरईआई कार्यक्रम शुरू किया था । यह कार्यक्रम सात राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चलाया जा रहा है। भारत और दूसरे एशियाई देशों में अक्सर यह सुना जाता है कि अब दूसरी हरित क्रांति लाने का समय आ गया है। यह एकदम भ्रामक बात है, क्योंकि कृषि में अगला कदम 1960 के दशक के मध्य में हुई हरित क्रांति के मुकाबले कहीं ज्यांदा जटिल, खर्चीला और समय लेने वाला होगा।

हरित क्रांति की शुरुआत-

देश में हरित क्रांति की शुरुआत वर्ष 1966-67 में हुई थी। हरित क्रांति के अग्रदूत कहे जाने वाले नॉरमन बोरलॉग खुद को ग्रेट डिप्रेशन की देन कहा करते थे और वे एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने दुनिया की खाद्य समस्या को हल करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्हें हरित क्रांति का जनक भी कहा जाता है और शांति के नोबेल पुरस्कार प्रेजीडेंट मेडल आफ फ्रीडम और कांग्रेसनल गोल्ड मेडल के साथ ही भारत के नागरिक सम्मान पद्म विभूषण सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। हालांकि नॉरमन बोरलॉग हरित क्रांति के प्रवर्तक माने जाते हैं लेकिन भारत में हरित क्रांति लाने का श्रेय सी सुब्रमण्यम को जाता है और एम एस स्वामीनाथन एक जाने माने वनस्पति विज्ञानी थे जिन्होंने भारत में हरित क्रांति लाने में सी सुब्रमण्यम के साथ अहम भूमिका निभाई थी।

हरित क्रांति की शुरुआत दो चरणों में की गई थी। पहला चरण 1966-67 से 1995-96 और दूसरे चरण में ब्रिंगिंग ग्रीन रिवोल्यूवशन इन ईस्टीर्न इंडिया बीजीआरईआई कार्यक्रम 2010-2011  में शुरू किया गया । हरित क्रांति से अभिप्राय देश के सिंचित और असिंचित कृषि क्षेत्रों में ज्यादा उपज वाले संकर और बौने बीजों के इस्तेमाल के जरिये तेजी से कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी करना है । हरित क्रांति की विशेषताओं में अधिक उपज देने वाली किस्में उन्नत बीज, रासायनिक खाद, गहन कृषि जिला कार्यक्रम, लघु सिंचाई, कृषि शिक्षा,पौध संरक्षण, फसल चक्र,  भू-संरक्षण और ऋण आदि के लिए किसानों को बैंकों की सुविधाएं मुहैया कराना शामिल है।

राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में चिन्हित

12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण पत्र में योजना आयोग ने इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में चिन्हित किया है ताकि हरित क्रांति को पूर्वी क्षेत्र के सभी कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों जहां प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की अच्छी संभावना है में विस्तारित किया जाए ताकि खाद्य सुरक्षा एवं कृषि सततता को प्राप्त किया जा सके।

अब देश के समक्ष दूसरी हरित क्रान्ति के प्रमुख तीन लक्ष्य होने चाहिए जिनमें खाद्यान आत्मनिर्भरताए उचित बफर स्टाक तथा अनाज का बड़े पैमाने पर विदेश को निर्यात है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिक दृष्टि से काम करना होगा। आधुनिक तकनीकों का उपयोग तथा कृषि उत्पादों का मूल्य सवर्ध्दन करना पड़ेगा। लगभग सभी विकसित देशों में प्रति हेक्टेयर अन्न का उत्पादन भारत के सापेक्ष 2 से 3 गुना है अतः इन्ही तकनीकों का इस्तेमाल कर भारत में भी अन्न का उत्पादन इसी अनुपात में किया जा सकता है।

बजट में प्रावधान-

पूर्वोत्तर भारत में हरित क्रांति के लिए केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2012-13 के बजट में 400 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी कर कुल आवंटन 1000 करोड़ रुपये का किया था।

पहली हरित क्रान्ति के परिणाम

पहली हरित क्रान्ति के दौरान पारम्परिक कृषि में तीन महत्वपूर्ण बदलाव हुए जिनमें अधिकाधिक भूमि सिचांई के अन्तर्गत लाई गई। वर्तमान कृषि भूमि पर फसल को उपजाया गया तथा महत्वपूर्ण उच्च उत्पादकता वाले बीजों की विभिन्न किस्मों के साथ उवर्रकों का प्रयोग किया गया। भारत के आत्म निर्भर हो जाने के बाद कृषि के क्षेत्र की ओर ध्यान कम कर दिया गया। चॅूकि पहली हरित क्रान्ति के समय मुख्य लक्ष्य खाद्य निर्भरता थी जिसे प्राप्त कर लिया गया था। बाद में भविष्य की कोई नीति न होने के कारण अब फिर भारत के समक्ष खाद्यान्न आयात की आवश्यकता समय-समय पर महसूस होने लगी है। भारत की सरकार ने सेवा क्षेत्र तथा उत्पादन क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया एवं कृषि तथा कृषक को उपेक्षित किया। परिणाम स्वरूप खेती और किसानों की हालत खस्ता हुई तथा अन्न उत्पादन भी बढ़ती आबादी के अनुरूप तालमेल नहीं बिठा पाया।

पहली हरित क्रान्ति के बाद भारत में खाद्य सुरक्षा का अर्थ केवल गेंहू और चावल से जोड़ दिया गया। देश में पैदा होने वाले 370 तरह के प्रचलित अनाजों की हर संभव उपेक्षा की गई। जिससे उनका उत्पादन और उपलब्धता लगभग शून्य होती गई है। इससे खेती की तकनीकें और फसल चक्र भी टूटा है और पोषण की असुरक्षा भी बढ़ी है। आज सरकार भी सरकारी भंडारण की नीति के तहत केवल गेंहू और चावल की खरीदी करती है, ज्वार, बाजरा, कोदो,कुटकी, रागी,चना, दलहन की कोई खरीदी नहीं होती है। इससे पूरे देश में खाद्य सुरक्षा और खाद्य संस्कृति दोनों को ही गहरा नुक्सान पंहुचा है।

विदेशी निवेश की क्या आवश्यकता?

हमने अपनी सरकार से यह सवाल कभी क्यों नहीं पूछा कि आखिर खेती में विदेशी निवेश की जरूरत क्यों है? सरकार ने पिछले 10 वर्षों में कर्ज और बीमा आधारित ऐसी तकनीकें अपनाई हैं, जिनसे किसान कंपनियों का बंधुआ बन गया है। किसान को संरक्षण देने का तर्क देकर कृषि बीमा योजना शुरू की गई। पर यह एक सामूहिक बीमा योजना है, जिसके अब तक के क्रियान्वयन से पता चला है कि किसानों को 80 प्रतिशत नुकसान की तो भरपाई का प्रावधान ही इसमें नहीं है।

खेती के लिए तो थोड़ी बहुत सब्सिडी बजट में बची है, वह अब सीधे उर्वरकए कीटनाशक, मशीन और ट्रेक्टर बनाने वाली कंपनियों को देने की पहल कर दी गई है। इसके साथ ही ठेका खेती या कांट्रेक्ट फार्मिंग के तहत कम्पनियाँ बड़े किसानों के समूह बना कर अपनी जरूरत के मुताबिक उत्पादन करवायेंगी, जैसे मूगफली, लहसुन, टमाटर, आलू, कपास, सोयाबीन, गन्ना कुछ ऐसी फसलें हैं, जिनकी प्रोसेसिंग होती है। इनका उत्पादन ठेका खेती के तहत होगा। इस नीति से बाजार वाली नकद फसलों का उत्पादन बढेगा और अनाज का उत्पादन कम होगा।

एक तरफ तो सरकार सूखे में खेती की साधन और तकनीकें ढूढ़ रही है, तो वही दूसरी और ऐसी फसलों और बीजों को सरकारी कार्यक्रमों के तहत बढ़ावा दिया जा रहा है, जिनमें देशी बीजों की तुलना में कई गुना ज्यादा पानी की जरूरत होती है और बिना रसायनों के उत्पादन को सुरक्षित नही रखा जा सकता है। पर ऐसी खेती ही औद्योगिक घरानों की हित में है, उन्हें इससे लाभ होता है। सो सरकार ने खेती के क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए अब पूरा खोल दिया है, यानी जो कंपनी जैसा चाहेंगी वैसा कर सकेगी, सरकार को बस कुछ आंकड़े चाहिए होंगे।

दूसरी हरित क्रान्ति के विषय में एम.एस स्वामिनाथन का विचार-

कई लोग आवाज उठाने लगे हैं कि अब दूसरी हरित क्रांति का वक्त आ गया है। फूड सेक्यूरिटी बिल इसका ही आगाज है लेकिन पहली हरित क्रांति के जनकों में एक एम.एस. स्वामीनाथन जोर से कह रहे हैं कि दूसरी हरित क्रांति भी सम्भव नहीं होगी। वे ऐसा क्यों कह रहे हैं- स्वामीनाथन की आपत्ति दो स्तरों पर है। पहली इस स्तर पर कि सरकार कृषि क्षेत्र के विकास के बारे में न ईमानदार है, और न सावधान है! वे आंकड़े देते हैं कि पिछले बजट में कहा गया था कि दलहन के उत्पादन में तेजी लाने के लिए सरकार 60 हजार गांवों को विशेष प्रोत्साहन देगी। बजट में इसके लिए 300 करोड़ रुपयों की व्यवस्था की गई। मतलब एक गांव को दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए 50 हजार रुपये दिये गये। क्या कोई कृषि जानकार व्यक्ति बता सकता है कि 50 हजार रुपयों की सहायता से आप किसी गांव की खेती का ढांचा बदल सकते हैं क्या स्वामीनाथन यहां इसका हिसाब भी नहीं लगा रहे हैं कि कोई भी सरकारी रकम दिल्ली से चलकर किसी मोतिहारी तक पहुंचनेमें कितनी रह जाती है! वे तो कह रहे हैं कि अगर पूरी की पूरी रकम ही गांव तक पहुंच जाये तो भी वह इतनी कम है कि आप उससे कुछ कर नहीं सकते हैं। यह रही ईमानदारी में कमी की बात!

फिर स्वामीनाथन दूसरा आंकड़ा देते हैं कि कृषि में बड़ी चिंता के साथ 300 करोड़ रुपयों का निवेश करने वाली सरकार उद्योगों को उसी बजट में 373 लाख करोड़ रुपयों की कर छूट इस तरह दे देती है कि उस बारे में कोई र्चचा भी नहीं होती है। स्वामीनाथन नाराज हैं कि यह सरकार कृषि क्षेत्र की उपेक्षा ही नहीं कर रही है बल्कि वह इसे खोखला बनाने में भी लगी है। स्वामीनाथन बताते हैं कि दूसरी हरित क्रांति के लिए हमें चार जरूरी कारक चाहिए। हमें ऐसी टेक्नॉलाजी चाहिए जो उपज में कई गुना ज्यादा वृद्धि कर सके। हमें बेहतर सुविधाएं चाहिए, जैसे कि बिजली, सड़क आदि। हमें सरकारी नीतियों से बंधा अनुकूल बाजार चाहिए तथा अंतिम यह कि किसानों में इसके प्रति उत्साह चाहिए। वे दूसरी हरित क्रांति के लिए इस उत्साह को सबसे अहम मानते हैं। आज इस स्थिति से स्वामीनाथन परेशान व दुखी हैं। वह उसी का विकास है जिसका बीजारोपण उन्होंने ही किया था।

समस्याएं-

उस विकास का क्या लाभ जो किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़े। हमें पंजाब से सीख लेनी चाहिए जहाँ प्रथम हरित क्रांति के का कारण पंजाब जैसे राज्य की मिट्टी कि उर्वरक क्षमता खत्म हो गयी, पानी जहरीला हो गया।

दुखद यह है कि अधिकांश जगहों पर इस योजना के अंतर्गत हाइब्रिड बीजों, खाशकर चावल एवं मक्के में, एवं रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है। नई हरित क्रांति स्वागत योग्य जरूर है क्योंकि हम पूर्वी राज्यों में हरित क्रांति के तहत निवेश कर रहे हैं परन्तु हमें कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना होगौ हमें सावधानी बरतनी होगी कि नई हरित क्रांति हमारे उत्पादक संसाधन को नुकसान नहीं पहुंचाए बल्कि उनमें सुधार लाये। इस नई हरित क्रांति के फलस्वरुप अंततः किसानों को गरीब और ऋणी न बनने दिया जाए। किसी की आत्महत्या करने की बारी न आये। हमें सजग रहना होगा। हमें आखिरकार उन्नति देखनी है हमें सिर्फ विशिष्ट पैदावार पर ही ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए बल्कि किसानों की शुद्ध आय पर भी पूरा ध्यान लगाना चाहिए।

भूमि क्षरण, पानी की कमी, प्रदूषण आदि हरित क्रांति के विरासत के रूप में दिखाई दे रहे हैं। इस दौरान पंजाब के किसानो के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर देखने को मिले हैं, और इन सबके विपरीत सच यह है कि जिन जगहों पर हरित क्रांति नहीं शुरू की गई वहां ज्यादा प्रभावशाली वृद्धि दिख रही है। देश का पंजाब आज कैंसर कि राजधानी बन गया है। भटिंडा से बीकानेर के लिए जो ट्रेन चलती है उसका नाम कैंसर एक्सप्रेस रखा गया है। यह सब प्रथम हरित क्रांति के कारण हुई, जिससे हमें सीख लेनी चाहिए।

 समाधान-

अब जबकि देश के प्रधानमंत्री जी ने नवीन हरित क्रांति का आव्हान किया है तो इस दिशा में कुछ गंभीर प्रयास जरूरी है सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होगा। आने वाले दस वर्षों के लिए कृषि भूमि एवं कृषक को प्राथमिकता पर रखना पड़ेगा, क्योंकि अभी तक ऐसा कुछ भी ठोस कदम अब तक नजर नहीं आया है जबकी हम एक और हरित क्रांति लाना चाहते हैं। हम अपनी अर्थव्यवस्था की विकास दर को खेती से संबंधित कर जैविक खेती को अपनाकर बढ़ सकते हैं।

वहीं राष्ट्रीय कृषक आयोग के सुझावों पर गंभीरता से ध्यान देकर अमल करने की महती आवश्यकता है।

इसके साथ-साथ मानसून जल व भूमिगत जल के अधिकतम उपयोग के साथ पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में कृषि योजना बनानी आवश्यक है

विशेष औद्योगिक क्षेत्रों की भांति विशेष कृषि क्षेत्र के गठन पर गहन चिंतन एवं अमल की जरूरत है।

इस हरित क्रांति के लिए बीजों की उन्नत प्रणाली पर शोध भी एक गंभीर मुद्दा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि को देखते हुए यह आज से सोचना पड़ेगा कि आने वाले समय में यदि फसलचक्र बदला जिसकी की पूर्ण संभावना है, तब क्या पद्धति एवं उपाय होंगे जो कृषि भूमि एवं कृषक के हितों का संरक्षण करेंगे। क्योंकि आज भी किसान की आय का अधिकांश भाग कृषि संसाधनों के लिए ही व्यय हो जाता है व उसका हाथ अंततः खाली ही रहता है।

देश के अनेक भागों में किसानों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाएं हुई जो शायद बगैर योजना के कृषि संसाधनों में किये गये निवेश का परिणाम थीं। क्योंकि आज के समय में किसान पशुधन के बजाय मशीनों पर ज्यादा निर्भर हो चुका है। ऐसे समय में पशुधन के सदुपयोग की योजनाएं भी बनानी पड़ेंगी क्योंकि आज के वातावरण के परिपेक्ष्य में पशुधन का उपयोग भी कृषक के हित में है।

इसके अतिरिक्त खेती के लिए सहकारिता का मॉडल भी अपनाया जा सकता है। अभी तक सहकारिता का प्रयोग कर्ज बांटने एवं उपज बेचने जैसे कामों के लिए ज्यादा हुआ है। अब यदि खेती करने के लिए कृषि भूमि का समूह सहकारिता के आधार पर बनाया जाये तो बड़ी भूमि पर कम लागत व शामिल लागत में अधिक उपज के लिए खेती के संसाधन प्रयोग में लाए जा सकते हैं फिर वो चाहे ट्रेक्टर व सिंचाई पंप हों, जैविक उर्वरकों का उपयोग हो या फिर हार्वेस्टर से फसल काटने की बात।

संसद में पेश 2012-13 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि बढ़ती आबादी को भोजन उपलब्ध कराने के लिए खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी की सख्त आवश्यकता है। इसके लिए कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी तथा बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निजी निवेश की जरूरत है।

निष्कर्ष में यह कह सकते है कि देश के जी0डी0पी0 में मात्र 15 फीसद का योगदान करने वाला कृषि क्षेत्र देश की 50 फीसद से ज्यादा आबादी को रोजगार देता है। जीने के साधन मुहैया कराता है। और यह तब है जबकि हमने इस क्षेत्र की कमर तोड़ रखी है। इसलिए दूसरी हरित क्रांति का सीधा मतलब है खेती किसानी को बाजार के दानव से बचाया जाये और उसे जीवन व जीविका के बुनियादी अधिकार से जोड़ा जाये, उसे संवैधानिक संरक्षण दिया जाये। खेती मनुष्य के जीने का आधार है। इसकी किसी व्यापार से तुलना नहीं हो सकती है और न किसी व्यापार के दबाव में इसे रखा जा सकता है। जमीन तेजी से सिकुड़ रही है क्योंकि खेतों को खत्म कर ही हमारे विकास की सारी इमारतें खड़ी होती हैं। इसलिए भी जरूरी है कि किसान व किसानी को हम अलग तरह से पहचानें और संभालें। नयी हरित क्रांति का नया सूत्र होना चाहिये स्वावलम्बी खेती व स्वावलम्बन के लिए खेती! पहली हरित क्रांति ने इसकी जड़ पर ही प्रहार किया था, अब देखना है कि क्या दूसरी हरित क्रांति इसे जड़समेत बचाएगी?

 

शार्ट वर्ड्स आर द बेस्ट एण्ड ओल्ड वर्ड्स बेस्ट आफ आल

यह पोस्ट मेरी एक फ्रैण्ड के लिखे हुए लेख को पढ़ने के बाद लिखी है और यह कोई उस लेख पर की गयी प्रतिक्रिया नही बल्कि मन में जो विचार उभरे उन्हें बिना किसी सम्पादन के लिख रही हूं क्योकि बात भाषा की परिशु़द्धता व आज की आधुनिक शब्दावली को ध्यान में रखते हुये लिखी गयी थी यह विषय तो चर्चा का ही है कि पहले की भाषा क्या थी और अब क्या है? और हम सभी यह जानते है कि चर्चा का हश्र क्या होता है रोज किसी न किसी नये मुद्दे पर चर्चा होती है, चार पांच विशेषज्ञ आते है और गूगल पर खोजे हुए आंकड़े देते है कि इस वर्ष ऐसा हुआ पिछले वर्ष ऐसा हुआ था और कभी दिल्ली की बात होगी तो कभी मुम्बई की और मामला वहीं, कभी टमाटर तो कभी प्याज़ और हम फिर से बिना किसी बात का उत्तर पाये चादर ओढ़कर सो जायेंगे…खैर हटाइये इस पर तो दिन प्रतिदिन चर्चा होती ही रहेगी बात थी पहले की भाषा और और आजकल की भाषा…

भाषा को परिभाषित करने के जरूरत नही है उसके गुण और पहलुओ पर ध्यान देने की बात है कि भाषा परिवर्तनशील है और जिसमें परिवर्तनशीलता का गुण है तो फिर उस पर चर्चा क्या करना हां अगर परिवर्तनशीलता का गुण नकारात्मक पहलू में है तो ज़रूर सोचने की बात है। इस बात को कोई नकार नही सकता है कि हमारी संस्कृति से ही हमारी पहचान है और संस्कृति के विभिन्न पहलू है जिसमें से भाषा की भी मुख्य भूमिका है। हमारा साहित्य तो अमूल्य है ही क्योकि उसकी हर एक पंक्ति व वाक्य जीवन जीने की कला सिखा जाती है और इसीलिये साहित्यकारों व लेखकों को हमेशा ही उच्च दर्जा प्राप्त है और हमेशा रहेगा। भाषा व्यक्ति पर निर्भर करती है कि वह व्यक्ति कौन है और किस वर्ग को सम्बोधित कर रहा है? यदि वह प्रोफेसर है तो निश्चित रूप से वह भाषा की शु़द्धता पर ध्यान देगा और किसी भी व्यक्ति द्वारा भाषा पर की गई छेड़छाड़ उसे बिल्कुल भी बर्दाश्त नही होगी वहीं दूसरे ओर एक युवा अगर LOLs और ROWLF जैसे शब्दों को उस वाक्य में लगाकर ऐसी बात बोल जाते हैं जो हो सकता है कि संसदीय भाषा में न कही गयी हो पर ऐसी बातें जरूर कह जाता है जिन पर विचार किया जा सकता है। हमें तो खुश होना चाहिये कि किसी व्यक्ति ने एक ऐसे शब्द की खोज की जिसे एक कम्यूनिटी स्वीकार कर रही है और जब ज्यादा से ज्यादा उस भाषा को लोग बोलने लगते है तो उसे मानकीकृत कर दिया जाता है फर्डीनेंड डी सास्योर भी भाषाविज्ञान के सिद्धान्तों में यहीं कहते है। हम क्यों पिछले और अगले की तुलना करे क्योकि हर दशक, हर शताब्दी की अपनी एक भाषा होती है उसका अपना साहित्य होता है हम जयशंकर प्रसाद की तुलना इक्कीसवीं सदी के किसी लेखक से तो नही कर सकते न या और न ही चाल्र्स डिकेन्स की तुलना किसी आज के लेखक से…
खुशी इस बात की होनी चाहिये कि अगर कोई युवा अपने माता-पिता जिन्हें शायद स्मार्ट फोन चलाना न आता हो उन्हें उस स्मार्ट फोन की शब्दावली सिखाकर उसे चलाना सिखाते है कि वाट्स ऐप क्या होता है, ये एंग्री बर्ड कौन सा नया राष्ट्रीय पक्षी है जिसके बारे में लोग बात करते है? आप उस बन्दे की सीखने की इच्छा की तारीफ कीजिये कि वह इस उम्र में भी सबकुछ सीखना चाहता है।
ये नया पुराना, प्राचीन और नवीन में हमेशा मतभेद रहेंगे और यह चर्चा कभी खत्म नही होगी क्योकि पहले और बाद में एक जनरेशन गैप है और यह जनरेशन गैप तो हमेशा ही रहेगा जरूरत इस गैप को भरने की है। अगर दोनो ही पीढि़या मिलकर इस गैप, इस रिक्तता को भर रहे है तो निश्चित रूप से यह एक अच्छी बात है। घर में अगर एक बच्चा पैदा होता है तो सभी को खुशी होती है। कोई दुःखी नही होता। जरूरी नही है कि ये लिंगो साहित्य या संसदीय भाषा का हिस्सा बने मगर ये लिंगो किसी भी वाक्य में जुड़कर आजकल सोशल साइट्स पर अपना अस्तित्व किसी भी सामाजिक मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देने में निभा रहे है। चलिये इस गैप को भरने की लिटिल सी कोशिश करते है

  • ASAP   –  As Soon As Possible
  • ASAIC   –  As Soon As I Can
  • LOL   –  Laugh Out Loud, Lots of Love
  • TU   –  Thank You
  • JFY   –  Just For You
  • MTUK   –  More Than You Know
  • OSLT   –  Or Something Like That
  • ACC   –  Actually
  • ACE   –  Excellent or Great
  • AFS   –  Always Forever and Seriously
  • APP   –  Application
  • AUO   –  I don’t know
  • AW   –  Any Way
  • B4   –  Before
  • BBS   –  Be Back Soon
  • BBL   –  Be Back Later
  • BBN   –  Be Back Never
  • BBT   –  Be Back Tomorrow
  • BOT   –  Back On Topic
  • CYL   –  Catch You Later
  • DAM   –  Don’t Ask Me
  • DAQ   –  Don’t Ask question
  • DAT   –  That
  • DDT   –  Don’t Do That
  • F9   –  Fine
  • FBF   –  Facebook Friend
  • G2E   –  Go To Eat
  • G8   –  Great
  • H2CUS   –  Hope To See You Soon
  • HAGL   –  Have A Good Life
  • HBU   –  How About You
  • HDU   –  How Dare You
  • HEY   –  Hello, Hi
  • HF   –  Have Fun
  • HHOJ   –  Ha Ha, Only Joking
  • HHOK   –  Ha Ha, Only Kidding
  • HHVF   –  Ha Ha, Very Funny
  • hm…   –  Thinking
  • I IAS   –  In A Second
  • IB   –  I’m Back
  • IHS   –  I Hope So
  • IK   –  I Know
  • J4F   –  Just For Fun
  • J4L   –  Just For Laugh
  • JLT   –  Just Like That
  • K   –  Okay
  • KL   –  Cool
  • B4   –  Before
  • IDK   –  I Don’t Know
  • L8   –  Later
  • L8ER   –  Later
  • ME2   –  Me Too
  • N   –  And
  • N2G   –  Need To Go
  • NOPE   –  No
  • O7   –  Salute
  • OOPS   –  If you make a mistake, you can say
  • OYE   –  Listen up
  • PPL   –  People
  • PRO   –  Professional
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  • Q&A   –  Question and Answer
  • RI8   –  Right
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  • U   –  You
  • UR   –  Your
  • W/   –  With
  • W/O   –  Without
  • W/E   –  Whatever
  • W8   –  Wait
  • WC   –  Welcome
  • W^   –  What’s up
  • XLNT   –  Excellent
  • X_X   –  Dead
  • Y   –  Why
  • YEAH, YH   –  Yes
  • BTW   –  By The Way
  • BRB   –  Be Right Back
  • JK   –  Just Kidding
  • zzz   –  Sleeping
  • JK   –  Just Kidding
  • FYI   –  For Your Information
  • WTH   –  What The Hell
  • LMK   –  Let Me Know
  • OMG   –  Oh! My God

बाकी क्या बोले यही कह सकते है कि शार्ट वर्ड्स आर द बेस्ट एण्ड ओल्ड वर्ड्स बेस्ट आफ आल।  व्यक्तिगत तौर पर कहें तो इतने ज्यादा शार्ट वर्डस् तो हम भी इस्तेमाल नही करते पर सीखने में क्या जाता है?

अभी हम जग रहे हैं…

अंकित कहां है?… अम्मा का सवाल अपनी बहू से और  उनका जवाब अंकित कम्प्यूटर पर बैठा है। जितने बार भी अम्मा अपने पोते के लिये पूंछती तो जवाब यही मिलता। अब अम्मा को भी लगता आखिर ये क्या है जिस पर बैठा जाता है और घर के सभी लोग उसपर बैठे रहते हैं। कभी बिट्टू बैठ जाती है तो कभी अंकित… आखिर ये लोग मेरे पास इस कम्प्यूटर की वजह से नही आते और कम्प्यूटर कहते वक्त उनकी ज़बान ज़रा भी लड़खड़ाती नही थी।
    अस्सी साल की बहुत भारी शरीर वाली अम्मा जिनकी आंखो का आपरेशन भी सफल नहीं हो पाया था तो ठीक से दिखता भी नही था। एक बार चलते-चलते गिर गयी थी तो पैर की हड्डी टूट गयी थी। डाॅक्टर ने भी मना कर दिया था इतने बुढ़ापे में हड्डी जुड़ नही पायेगी।  तब से दस सालो से अम्मा  आॅन बेड ही थी। अम्मा के दोनो बहू-बेटे व सभी पोते-पोतियां उनका कहना भी खूब मानते है। वरना आजकल इतनी वृ़़द्धावस्था तक भी कोई बड़े ठाठ से थोडे न रह पाया है।
    अम्मा तो अपने परिवार पर पूरा रूआब जमाती थी। अपने खेतों का सारा हिसाब भी वह बिस्तर पर पड़े-पड़े ही ले लिया करती थी और दिमाग इतना तेज कि सब याद रहता कि पिछले साल कितनी फसल हुयी थी इस बार कितनी हुयी है? और तो और गर्मियों में आम की बाग का हिसाब भी ले लिया करती थी।
    अम्मा को हर नयी चीज सीखने का एक ज़ज्बा था तभी तो बिट्टू ने अम्मा को अंगे्रजी समझना तक सिखा दिया था और  बिट्टू के पापा जब आॅफिस से घर आकर किसी से भी पंूछते – ‘‘अम्मा स्लेप्ट़‘‘ तो अब अम्मा खुद ही कहती अंग्रेज़ी में जवाब न देकर हिन्दी में ही कहती ‘‘नही भैया अभी हम जग रहे हैं।‘‘
    सुबह सुबह घर में बजते रेडियो को लेटे लेटे ही सुनकर अम्मा डूडल न्यूज की तरह सब बताया करती कि आज देश में क्या हो रहा है साथ ही साथ कौन सी ट्रेन कब आ रही है और कौन सी ट्रेन लेट है। बिट्टू जब स्कूल से लौटकर घर आती तो मजाक में पूंछती, ‘‘अम्मा! आज कौन सी ट्रेन लेट आ रही है‘‘ और वो बता देती फिर घर के सब लोग हंस जाते।
कोई घर पर बीमार पड़ जाता तो अपने घरेलू नुस्खें भी बताती किसी जड़ी-बूटी का नाम लेती और कहती कि उसकी पत्तियों का रस कान में डाल दो तो सही हो जायेगा। बिट्टू को अब जबकि वह बातोे को समझने लगी है तो  लगता है कि आचार्य लालकृष्ण सारी औषधियों के बारे में अम्मा से ही पूंछकर गये थे क्या?
आज बिट्टू को अपने लैपटाॅप पर काम करते हुए ये लगा उस समय जब अम्मा कहा करती थी कि उन्हें भी कम्प्यूटर पर बैठना है तब कि जब ये पासिबल नही था और आज अगर वह होती तो उनके लैप में जरूर ये लैपटाॅप रखकर उन्हें सिखा देती कि ‘‘अम्मा जब तक आप जग रही हो तो इसे भी सीख लो‘‘। उनका ये जागता हुआ मन ही तो था जो हर चीज सीखने को तैयार रहता था, नयी नयी चीजें खाने में भी कभी मन हिचकता नही था तभी तो बिट्टू के फेवरेट नूडल्स भी अम्मा को भी अच्छे लगते थे। अम्मा शरीर से जरूर बूढ़ी हुयी थी पर मन कभी बूढ़ा नही हुआ था उनका।  

मुझे निराशा होती है उपाधिधारी लोगों से, मुझे निराशा होती है पढ़े लिखे लोगो से।”

डा0 नरेन्द्र कोहली जो कि एक उपन्यासकार हैं, कहानीकार हैं, नाटककार हैं तथा व्यंग्यकार हैं। ये सब होते हुए भी , वे अपने समकालीन साहित्यकारों से पर्याप्त भिन्न हैं। साहित्य की समृद्धि तथा समाज की प्रगति में उनका योगदान प्रत्यक्ष है। उन्होंने प्रख्यात् कथाएं लिखी हैं ; किंतु वे सर्वथा मौलिक हैं। वे आधुनिक हैं ; किंतु पश्चिम का अनुकरण नहीं करते। भारतीयता की जड़ों तक पहुंचते हैं, किंतु पुरातनपंथी नहीं हैं।
    उनका एक बहुत ही प्रभावी भाषण आप सभी के साथ शेयर कर रहे है जो कि उन्होंने 8 दिसम्बर 2012 को देव संस्कृति विश्वविद्यालय के मृत्युंजय सभागार में एलुम्नाई मीट पर दिया था, जिसमें उन्हांेने कुछ सामाजिक कुरीतियों पर प्रकाश डाला था। उस सभागार में आपकी अनुपस्थिति को उपस्थिति में बनाने का एक छोटा सा प्रयास किया है। जिससे डा0 कोहली जी के विचारों से आप और हम भी अवगत हो सके, साथ ही साथ उनके जैसा बहुत कुछ नही तो कुछ बहुत जरूर कर सकते है। प्रस्तुत भाषण उन्हीं के शब्दों मेंः-

“मेरा मन नही मानता इन बातों को…क्यों नहीं मानता क्योंकि जब मैने स्वामी विवेकानन्द के माध्यम से पढ़ा कि हमारे उपनिषद में यह एक मंत्र है मुझे संस्कृत नही आती! ये मेरा दुर्भाग्य है! इसलिये संस्कृत में इसको नही बोेल पाता पर उसका अर्थ यह है कि विधाता ने पिछले कल्प के चन्द्र से इस युग का चन्द्रमा बनाया पिछले सूर्य से इस युग का सूर्य बनाया तो मेरे मन में यह बात आती है कि ये तो चन्द्रमा पर जाने की बात कर रहे थे और आप हजारों वर्ष पहले चन्द्रमा के निर्माण की बात कर रहे है कि वह कैसे बना मुझे ये मंत्र पूरा चाहिये था। संयोग से ये मेरे हाथ से निकल गया था तो मैं पड़ोस में प्राचीन भारतीय इतिहास के एक प्रोफेसर के पास गया तो वो पुस्तकालय गये और वो मंत्र के साथ-साथ उसका अर्थ भी लिख लाये थे। मैं आपको ये बता दंू कि अर्थ मैने मांगा नही था। उन्होने बताया पहले सूर्य बना और उसके बाद चन्द्रमा। मैने कहा पिछले कल्प के चन्द्रमा से इस कल्प का चन्द्रमा बना और पिछले कल्प से इस कल्प का सूर्य बना। उन्होने बड़े रूआब से कहा जो अर्थ मैं बता रहा हूं वह महान विद्वान ग्रिफिथ का है और प्रो0 ग्रिफिथ को  ‘‘मास्टर आॅफ वैदिक संस्कृत‘‘ कहा जाता है। मैने कहा महाराज! जो अर्थ मैं बता रहा हूं वह विवेकानन्द द्वारा बताया गया है।
    मैं नही जानता मैं आपके सामने उत्साह भरी बात कह रहा हंू या नही, पर मैं पीडि़त इस बात से होता या मुझे इस बात का दुःख होताा है कि जिसको हम पढ़ा लिखा व्यक्ति मानते है, वह ही क्यों इस देश के विरूद्ध है। मुझे अरविन्द याद आते हैं कि पूरे विश्व या पूरे देश के लिये सबसे बड़ा दुर्भाग्य का दिन वह दिन है जब हमारे देश के नागरिकों ने यह मान लिया कि हमारे प्राचीन ग्रन्थ कपोलकल्पना है। मैं नही जानता कि यह हमारे गुण है या दोष हैं पर हम भारतवासी बहुत जल्दी आरोपों को स्वीकार कर लेते है यह भी नही सोचते क्या सही है क्या गलत और मान लेते है कि हम तो है ही ऐसे।
    ओस्लो में एक संगोष्ठी थी रेलेवेन्स आॅफ महाभारत यानी महाभारत की प्रासंगिकता पर मैं बोलते-बोलते उस बात पर पहुंचा कि अर्जुन नेे गाण्डीव फेंक दिया और कृष्ण ने कहा गाण्डीव उठा। अब जो कुछ कहा आप लोग तो जानते है आप सब तो गीता पढ़ते ही है। इस बात पर नार्वे के विद्वान को आपत्ति हुयी और उन्होनें कहा डू यू वान्ट टू टेल अस दैट गीता टीच अस वायलन्स? महात्मा गांधी टाक्स आॅफ नाॅन वायलन्स।…अब मैं उनको क्या समझाता कि 1962 के बाद किसी ने यहां अहिंसा की बात नही की।पर ये मैने अवश्य बताया कि महात्मा गांधी गीता को गीता माता कहते थे और अगर वह गीता को माता मानते थे तो कृष्ण को भी मानते होंगे। ऐसा तो नही हो सकता जिसके माध्यम से गीता का गायन किया गया उसे ही न माना जाये। इसलिये हम ये समझे कि कृष्ण क्या कह रहे है? हिंसा क्या है? अंहिसा क्या है? प्रश्न यह है कि यह देश गांधी का है या कृष्ण का है। गांधी ने जो कहा वो गलत माने या कृष्ण ने जो कहा वो सही माने। बात वही है जो मैने पहले कहा था हम आरोपों को बहुत जल्दी स्वीकार कर लेते हैं।
    राजा राममोहन राय के किसी चचेरे मौसेरे भाई की पत्नी को सम्पत्ति के लोभ में उठाकर चिता में बैठा दिया। मैं कहंूगा कि वह एक हत्या थी, एक स्त्री को उसकी इच्छा के विरू़द्ध चिता पर बैठाना एक हत्या ही है लेकिन विदेशियों और अंग्रेजो ने क्या समझाया इसे कि हिन्दुओेें में सती प्रथा रही है और राजा राम मोहन   राय ने इसे मान भी लिया कि हिन्दुओं में प्राचीन काल से ही सती प्रथा रही है और उस प्रथा का उन्मूलन करने के लिये कानून बना। मेरे जैसा मूर्ख इंसान यह पूंछता है कि सती का अर्थ क्या है? सीता, द्रौपदी, मन्दोदरी, सावित्री इन सबको हम सती कहते है। सती का अर्थ क्या है? चितारोहण क्या है? जौहर क्या है? पढ़े-लिखे लोगों ने यह तुरन्त मान लिया कि सती होता है। पर क्या किसी ने इनके बीच अन्तर  जानने की कोशिश की। विवेकानन्द के उस काल में  कहा जाता है कि हिन्दू पति अपनी पत्नी को जिन्दा जला देता था और पति के मरने पर उसे तो चितारोहण करना ही पड़ता है। आप सब पढ़े-लिखे लोग है तो मैं आप लोगों से यह जानना चाहूंगा कि सतीप्रथा भारत मे किस युग मेें, किस काल में, कहां और कब थी? 
    महाभारतकाल में जब पाण्डु का देहान्त हुआ तो माद्री ने कुन्ती से कहा तुम्हारे पीछे मैं तुम्हारे बेटों को वो प्यार नही दे पाउंगी, जो प्यार तुम मेरे बेटों को दे सकती हंू मेरी कामवासना अभी शान्त नही हुयी है इसलिये मैं अपने पति के   साथ पतिलोक जाउंगी और चितारोहण करूंगी। इसके बाद हर्षवर्धन की मां प्रभाकरवर्धन की पत्नी ने स्वेच्छा से चितारोहण किया। मै जानता हूं कि कौशल्या अपने पति के साथ नही गयी, कुन्ती अपने पति के साथ नही गयी, सावित्री स्वयं पति को मृत्यु से खींच लायी और स्वयं नही गयी तो आप लोगों से यह जानना चाहता हंू कि भारत में सती प्रथा, प्रथा के रूप में कब थी?
    हमारे हिन्दू समाज में जाति है, वर्ण है क्या है? और मैं सोचता हूं जब मैने पढ़ा जाति क्या है? सुनार, लुहार, वैश्य है क्या हमने यह जानने की कोशिश की जाति, जाति नही बल्कि व्यवसाय है। एक अध्यापक है सौराष्ट्र में चाहिये तो खोज लीजिये वो अपने नाम के आगे कहार लगाते है। मैने उनसे पंूछा क्या आप पानी ढोते है? या फिर आप पालकी उठाते है? उन्होनें कहा नही तो जो व्यवसाय हम दसियो पीढ़ी पहले छोड़ चुके है? उसे अपने नाम के आगे लगाने का क्या मतलब बनता है? एक और सज्जन ग्वालियर में रहते है मोहन लाल मेवा फरोश हमने उनसे पूंछा कि तुम क्या करते हो? बताया कि इंजीनियर हंू। फिर मैने पंूछा कि तुम्हारे पिता, या दादा मेवा बेचते थे? उसने कहा नही तो फिर मैने पूंछा कि अपने नाम के आगे मेवा फरोश क्यों लगाते हो? तो उसने बताया कि ये तो हमारी जाति है। अब उस भले आदमी को कौन ये समझाये ये जाति नही होती।
    एक और बात विशेषकर भारत में वर्ण को लेकर सिर फटउव्वल बहुत होता है। कोई तो अहंकार से कहता है कि मैं सवर्ण हंू। कोई अहंकार से कहता है मैं दलित हंू। मुझे मेरा अधिकार चाहिये। आप पढ़े लिखे लोग है इसलिये कहता हूं कि आपका चिन्तन मौलिक होना चाहिये। जो कुछ मैकाले बताकर चला गया उसी पर चलना है क्या?
    वर्ण को लेकर कृष्ण ने चार प्रकार के लोगों को बताया। गुण और कर्म क्या है? एक व्यक्ति कहता है कि वह ब्राह्मण है, उस ब्राह्मण को क्या ब्राह्मण कहेंगे जो काम चाहे चाण्डाल का करे। पढ़े लिखे लोगों ने कहा जाति और वंश से वर्ण नही होता है उन्होने कहा व्यवसाय से होता है। व्यवसाय से होता तो जो अध्यापक है वो ब्राह्मण कहलाते, जो सेना में चला गया वह क्षत्रिय हो गया। महाभारत में एक प्रसंग आता है जब भीम को एक मृग ने जकड़ लिया तो भीम ने कहा कि मुझे छोड़ दो मैं और मेरे चार भाई राज्य नही बल्कि धर्म चाहते है तो मृग ने कहा कि पहले अपने बड़े भाई को बुलाओ तब मैं तुम्हे छोड़ूंगा। तब युधिष्ठिर आये और तब मृग ने प्रश्न किया यह यक्ष प्रश्न के अन्तर्गत नही आता। उसने पूंछा कि ब्राह्मण कौन? युधिष्ठिर ने कहा जो भिक्षा पर भी निर्भर रहकर ही स्वाध्याय करता है, समाज के हित के कार्य करता है, तपस्या करता है दान लेता व देता है इत्यादि बहुत से गुण बताये तो वह ब्राह्मण है। मृग ने कहा ये गुण तो शूद्र में भी हो सकते है तो  धर्मराज ने कहा कि ये गुण अगर शूद्र में है तो वह ब्राह्मण है। यही गुण और कर्म की कथा पार्वती ने शिव से कहा और शास्त्र जो कहते है उसको न समझकर पढ़ लिखे लोग जो कहते है उसको मान लेते है। अगर एक व्यक्ति या शास्त्र कहता है कि शस्त्र की सहायता लेकर अपने प्राणों को संकट में डालकर दूसरों की रक्षा करता है वह क्षत्रिय है और हम कहते है कि जो मूंछ ऐंठता है, जो मदिरा पीता है, व्यभिचार करता है, जो गलत काम करता है वह ठाकुर है।
    हमको अपने वर्ण को ठीक से समझना चाहिए। हमारे शास्त्र व कृष्ण कहते है कि हमारे हजारों जन्मों के पुण्य कर्मों के फल से इस जन्म की आपकी प्रकृति व स्वभाव आपका वर्ण है। विवेकानन्द ने कहा जो शरीर माता-पिता के जीन्स से बनता है। यह तो आप भी मानते होंगे क्योंकि विज्ञान भी यही कहता है। परन्तु हमारी आत्मा अपने पूर्व जन्मों से संस्कार लेकर आती है वह माता-पिता से नही आती, इसलिये वंश से तो वर्ण हो ही नही सकता।
    तो मित्रों! मैं समझता हंू कि मेरा समय तो अब हो गया है। इसका मतलब ये मत समझिये कि मेरा समय….मेरा मतलब मेरे बोलने का समय समाप्त हो गया है और जा रहा हंू आपको प्रणाम करके जाते-जाते फिर एक बात कहना चाहता हंू कि मुझे अनपढ़ लोगों से निराशा नही होती, मुझे नासमझ लोगों से निराशा नही होती है। मुझे निराशा होती है उपाधिधारी लोगों से, मुझे निराशा होती है पढ़े लिखे लोगो से।”

 

बहुत ज़रूरी था…

डिनर कर लो आकर…मम्मी की आवाज और बिट्टू जी की दोनो आंखे लैपटाॅप स्क्रीन पर और हाथ कीबोर्ड पर और मम्मी की बात को एक कान से सुन भी लिया पर फिर नही उठी। क्यों नहीं उठी? क्योकि बिट्टू मैडम इण्टरनेट पर है। चार-पांच महीने से यही शेड्यूल चल रहा है उनका, अब राइजर के पहले जो ‘‘अर्ली‘‘ एडजैक्टिव लगता था वो भी नही लगता क्योकि मैडम लेट राइजर जो हो गयी है, अब वो ब्रेकफास्ट भी नही करती बल्कि ब्रंच करती है।…वाओ! यू आर डेवलपिंग नाइस हैबिट्स बिट्टू! शी इज बोस्टिंग आन हरसेल्फ। पहले तुम जब मम्मी के पास नही थी तो तुम इसी खाने को मिस करती थी और अब जब मिल रहा है तब टाइम पर उनकी बात भी नही सुनती। वैरी बैड! ये सब बाते बिट्टू मन में सोच ही रही थी और जाकर मम्मी से बोली मम्मी मेरी गन्दी आदतो पर आप मुझे डांट दिया करो।
एक साथ बैठकर खाना खाये हुए भी तो कितना टाइम हो गया है। बेचारी डाइनिंग टेबल! उस पर तो जाने कितने दिनो से खाने से सजी हुयी प्लेट ही नही रखी गयी है। वो भी यही कह रही है मेरे सामने से जब तुम अपने लंच और डिनर की थाली अपने रूम में ले जाते हो उस वक्त तो बस मन करता है कि हे भगवान! मुझे किसी सुपर फ्लाॅप सीरियल के डाइनिंग सीन का हिस्सा ही बना देते भले ही डायरेक्टर कुछ देर के लिये शाट लेता पर उस शाट में लोग एक साथ बैठकर खाना तो खाते है और यहां तो मुझे कोई पूंछता ही नही…खैर मेरी ऐसी किस्मत कहां… और रही सही कसर टी0वी0 और लैपटाॅप ने पूरी कर दी। बिट्टू का ऐसा मानना है कि अपडेशन के चक्कर में इण्टरनेट और टी0 वी0 ने तो बिट्टू के घर में दूरियां बढ़ा दी है।
पहले तो ऐसा नही था। सब साथ में डिनर करते थे और खाना खाते खाते ही दिन भर में क्या कुछ हुआ आपस में शेयर करते थे और तो और टी0 वी0 भी साथ देखा करते थे। बिट्टू के पापा का फेवरेट प्रोग्राम ‘‘व्योमकेश बख्शी‘‘ जब टी0 वी पर आता था तो घर पर सब साथ में टी0 वी0 देखते थे और रजाई के अन्दर मूंगफली खाती हुयी बिट्टू कब सो जाती थी पता भी नही चलता था। अब तो बिट्टू के सोने की टाइमिंग भी नही पता है किसी को कि कब सोती है वो हां जगने की टाइमिंग जरूर पता है।
सिबलिंग्स की वो रिमोट वाली फाइट भी बिट्टू मिस करती है जब उसका कोई फेवरेट प्रोग्राम टी0 वी0 पर आता था और उसके दीदी और भईया उसे रिमोट नही देते थे कहते थे पहले ये चैप्टर तैयार कर लो फिर देंगे रिमोट और बिट्टू गुस्सा हो जाती थी फिर सब उसे मनाते थे और समझाते थे बिट्टू पहले पढ़ाई कर लो फिर जी भर के टी0 वी0 देख लेना और बिट्टू रोते रोते हुए ही सही पर मान जाती थी।
पर अभी कुछ दिनों पहले ही वैसा ही सीन बिट्टू को फिर से घर पर देखने को मिला जब एक दिल दहला देने वाली घटना देश की राजधानी में हुयी। घर पर सब एक साथ टी0 वी0 देख रहे थे और टी0 वी0 के स्क्रीन पर बिट्टू ने देखा अलग अलग जाति, धर्म के लोग सब एक जुट है सब उस हैवानियत भरी घटना पर अपने विचार रख रहे है। कोई पोयम बना रहा है तो कोई प्रोटेस्ट कर रहा है। सबने अपने भावों की अभिव्यक्ति किसी न किसी माध्यम से की। खैर ये मसला तो अब भी सुलझा नही है…इस पर और क्या बोला जाये क्योकि अब बोलने से काम नही चलेगा कुछ करने से ही चलेगा।
कुछ करने जैसा ही काम बिट्टू के घर के नियमों में भी हुआ है, कुछ अमेडमेन्ट्स हुए है जो कि अच्छे है। बिट्टू के पापा ने बिट्टू को थोड़ी डांट लगायी है कि वो देर तक सोती रहती है और अब से जल्दी जगने की आदत डाले जो कि बिट्टू के लिये बहुत जरूरी है और साथ ही साथ डिनर भी सबका साथ में होगा और उस टाइम पर कोई अपने सिस्टम, टी0वी0 और नेट पर नही होगा।
ये अमेंडमेंट बहुत जरूरी था घर पर। घर की डाइनिंग टेबल तो आज खुशी के मारे अपनी जगह से थोड़ा इधर उधर खिसकी जा रही है और मिस्टर लैपटाॅप बहुत दुखी है कि बड़ी मुश्किल से उसने बिट्टू की आदत बिगाड़ी थी अब ये हमें उतना टाइम नही देगी, पर बिट्टू बहुत खुश है कि हम सब फिर से साथ में डिनर किया करेंगे।

इत्ती सी हंसी इत्ती सी खुशी…

एक ही शहर में रहते हुए भी चार साल के बाद बिट्टू अपनी सहेली से मिलने जा रही है। उससेे मिलने की खुशी में जल्दी-जल्दी रिक्शा किया जिससे उसके बाद वो आॅटो कर सके। अब आॅटो का वेट हो नही पा रहा था तो बिट्टू ने सोचा अब नही… चलो इसी से चलते है जो पर डे पचास हजार लोगों को अपना साथी बनाता है और उन्हें उनकी मंजिलों तक पहुंचाता है। कौन? अरे भई ‘‘आपका अपना साथी‘‘ महानगर परिवहन सेवा। बिट्टू ने सोचा बहुत दिनों से इस साथी के साथ सफर नही किया है। वैसे इस साथी का परिचय भी हो ही जाना चाहिए अपने अलग अलग रूपों में कभी ये लो फ्लोर, सेमी फ्लोर, और वातानुकूलन की उपलब्धता भी करा ही देती है ये बसेज़… और एन्वायरमेन्ट का भी बहुत ध्यान रखती है क्योकि चाहे कितनी लम्बी लाइन हो इनकी मेस में…ये अपना पेट सीएनजी से ही भरती हैं।
    चलो जी! बिट्टू बस में भी चढ़ गयी पर बैठने की जगह नही मिली है और उसके सामने बस की सीट पर एक लेडी ऐसे बैठी हुयी थी जैसे उनका  ड्राइंग रूम हो देखते ही एक स्माइल मार दी बिट्टू  को और बिट्टू को लगा जैसे वह आन्टी उसी का वेट कर रही थी और स्माइल मार के ऐसा बोलने की कोशिश कर रही हो कि बेटा आती रह करो। दो-तीन मिनट बाद उनका स्टापेज आ गया और उतरते हुए बोली बेटा तू बैठ जा उधर…जी! आन्टी। वैसे तो खड़े होने में भी कोई दिक्कत नही थी पर ब्रेक लगने पर एक दूसरे से टकरा जाने के बाद साॅरी और इट्स ओके! की चालिसा जो चलती रहती है, वो नही करनी पड़ेगी।
    बिट्टू के सामने की भी सीट खाली हो गयी और उस पर एक और आन्टी अपने बच्चे के साथ आकर बैठ जाती है। फिर बिट्टू से एक पापुलर न्यूज़पेपर का नाम लेकर कहती है कि उसका आॅफिस आये तो बता देना बेटा। बिट्टू ने कहा जी! बिल्कुल। फिर अपने आप ही बताना शुरू कर दिया अपने बेटे की तरफ इशारा करते हुए बोली 3000 बच्चों में ड्राइंग काॅम्पटीशन में मेरा बेटा सेलेक्ट हुआ है। न्यूजपेपर वालों ने ही यह प्रतियोगिता रखी थी, इसीलिये वहां जा रहे है। बिट्टू ने कहा अच्छा। फिर उनके बेटे से पंूछा बेटा ड्राइंग मेें क्या बनाया था? उसने तुरन्त बताया एक रोता हुआ पेड़ और एक हंसता हुआ पेड़। बिट्टू ने कहा क्या बात है आजकल के बच्चें भी बड़े सेंसेटिव और समझदार होते है। ये सब बाते शायद बड़े न समझ पायें पर बच्चे जरूर समझ जाते है तभी तो आजकल टी0वी0 पर भी एक आॅनलाइन शापिंग कराने वाली कम्पनी के विज्ञापन में भी उन्हें बड़ो की ही तरह दिखाया गया है। फिर बिट्टू ने उस बच्चे से पूंछा अब वहां जाकर क्या बनाओगे? बच्चे ने बोला जो न्यूज़पेपर वाले अंकल बोलेंगे वही बनायेंगे। बिट्टू अपने बैग की सारी पाॅकेट्स चेक करने लगी पर एक भी नही मिली। वो क्या है न बहुत दिनों केे बाद बैग लिया है इसलिये बिट्टू के बैग में एक भी टाॅफी नही थी हमेशा से पड़ी रहती थी पर बहुत दिन हो गये उसने अपने बैग की रीफिलिंग टाॅफीज़ से नही की। इसलिए बिना टाॅफी दिये ही उस बच्चे को आॅल द बेस्ट कहा। लो….न्यूज़पेपर का आॅफिस भी आ गया। बस से उतरते हुए अपने छोटे-छोटे हाथों से उस छोटे बच्चे ने बिट्टू को बाय-बाय किया।
    सीट फिर खाली हो गयी अब बस शहर के एजूकेशनल ऐरिया में थी काॅलेज़ेस और जाने कितनी तरह की कोचिंग… आईआईटी जेईई, पीएमटी, एनीमेशन इस्टीट्यूट, सिविल सर्विसेज़, शार्ट टर्म कम्प्यूूटर कोर्स, लर्न टैली और इन सबमें एक सबमें बहुत ज्यादा भीड़ इकट्ठा करने वाली इंग्लिश स्पीकिंग के कोचिंग सेन्टरर्स सब यहीं है। सामने की सीट पर ब्लैक कलर का टाॅप और ब्लू जींस पहने और साथ ही पिंक कलर का वन शोल्डर बैग और हाथ में मोबाइल लिये हुए एक लड़की बैठ गयी और वह अपने मोबाइल के स्क्रीन को देखकर अपनी हंसी को होंठो मे छुपाने की कोशिश कर रही थी, शायद अपने किसी फ्रैण्ड से चैटिंग कर रही थी। उसे देखकर बिट्टू को भी हंसी आ गयी। फिर बिट्टू की नजर बस की विण्डो से बाहर रोड पर पड़ी… देखा तो काॅलेज स्टूडेंट का पूरा गैंग सी0सी0डी0(कैफे काॅफी डे) के सामने खड़ा हुआ था। फिर आगे चलते ही वो जगह भी आ गयी जहां पर दो साल पहले बिट्टू अपने काॅलेज से आकर सिटी बस का वेट करती थी पर यहां पर तो एक समोसे वाले की दुकान हुआ करती थी…पर अब नही है फिर नज़र गयी कि पांच मंजिला एक शापिंग काम्प्लेक्स बिट्टू को देखकर कह रहा हो क्यूं मुझे देखकर खुशी नही हुयी, जो उस समोसे की दुकान को याद कर रही हो। उसने भी कह दिया क्यूं नही खुशी हुयी… तुम्हें ही देखकर तो लगता इण्डिया कितना तरक्की कर रहा है और वास्तविकता क्या है ये तो सभी जानते है। वास्तविकता के मामले में भारत के उद्योग और वाणिज्य मामलों से जुड़े संगठन एसोचैम अपने एक सर्वेक्षण में कहता है  कि देश भर में लोग बड़े.बड़े शॉपिंग मॉल की बजाए किराना दुकानों से ख़रीदारी करना ज़्यादा पसंद करते हैं। खैर यह बात तो वैसे भी उस काम्प्लेक्स को नही बतायी जा सकती क्योकि उसमें उसकी तो कोई कसूर भी नही है और बनवाने वालों क्या कहा जाय? तभी रोड की तरफ नज़र गयी और जैसे कह रही हो कि सब बदल जायेंगे पर मैं नही बदलूंगी इस पर आने जाने वाले लोग बदल जायेंगे पर मैं यहीं रहूंगी। बिट्टू ने कहा हम्म…पता है कि तुम नही बदलोगी।
    ये रोड और रोड पर चलते हुए लोगों के बीच न जाने कब बिट्टू का स्टापेज भी आ गया… पर अभी उसकी सहेली का घर नही आया अरे भई! इतनी जल्दी उसकी सहेली  का घर आ जाये ये कैसे हो सकता है क्योकि बिट्टू के सारे फ्रैण्ड्स दूर-दूर जगहों पर ही तो रहते है और उनसे मिलना कोई आसान बात नही है। खैर दो घण्टे की जर्नी बस, आॅटो और रिक्शा से फाइनली वो उसके घर पहुुंच ही गयी और उससे मिलकर बहुत खुश हुयी, ढेर सारी बातें की और फिर घर वापस आ गयी।
    जिन्दगी भी तो ऐसी है  कभी हाइड एंड सीक का गेम खेलती हुयी बहुत शरारती हो जाती है। कभी ढेर सारी खुशियां दे जाती है, और कभी झमेला लगती है, कभी आंखे नम कर देती है, कभी आंसू भी हो तो पी लेती हैं, कभी तकरार कराती है तो कभी प्यार सिखाती है, कभी लाइफ के बड़े बड़े पाठ पढ़ाती है। हमेशा बड़ी खुशी के चक्कर में हम छोटी छोटी खुशियों को एन्जाय करना भूल जाते है पर ये छोटी-छोटी खुशियां ही तो बहुत खुशी दे जाती है। अगर बिट्टू अपने मन में सिर्फ यही लेकर चलती कि उसे अपनी सहेली से मिलना है तो बस में बैठी हुयी आंटी और उनका छोटा बच्चा, और वो काॅलेज जाने वाली लड़की जिसको देखकर एक दो सेकेण्ड के लिये ही सही हंसी तो आयी थी न! ये सब उसे खुशी न दे पाते। इन सभी लोगों ने तो बिट्टू के सफर को और खूबसूरत बनाया। इसलिये कैसी भी हो… पर ये जिन्दगी खूबसूरत है।

अलविदा भट्टी…

टी0 वी0 स्क्रीन के दायी तरफ लगा दूरदर्शन का लोगो और स्क्रीन पर चेहरे पर दाढ़ी और सिर पर पगड़ी लगाये हुए दर्शकों को उन्हीं की जिन्दगी में आने वाली कुछ ऐसी समस्याओं पर व्यंग्य मारते हुए कॉमेडी को एक नये अंदाज में पेश करने वाले डायरेक्टर, एक्टर और जाने कितनी भूमिकाओं को निभाने वाले जसपाल भट्टी हमारे बीच नही रहे।
उनके फेमस कॉमेडी शो ‘फ्लाप शो‘ के सिर्फ 10 एपिसोड ही ब्राॅडकास्ट हुए थे लेकिन उसने अपना इतिहास इण्डियन टेलीविजन के कॉमेडी सीरियल्स में जरूर अमर कर लिया। इस शो में कभी जसपाल भट्टी चीफ गेस्ट बन जाते है जो कि इण्डियन चीफ गेस्ट की तरह लेट न पहुँचकर किसी समारोह में जल्दी पहुँच जाते है तो उन्हें क्या-क्या परेशानियां आती है उस पर व्यंग्य मार देते है तो कभी शिक्षा व्यवस्था पर ऐसा व्यंग्य कि एक शोधार्थी अपना शोध अपने गाइड के अन्डर में रहकर कैसे पूरा करता है? इसके लिए उसे अपने प्रोफेसर द्वारा निपटाए जाने वाले काम भी करने पड़ते है जैसे उसकी सब्जी वगैरह तक लाना।
इस सीरियल के बाद भी कई काॅमेडी सीरियल आये और उन्होने दर्शको को गुदगुदाने की भी  कोशिश की। जैसे देख भाई देख, यस बाॅस, श्रीमान श्रीमती, हम पांच, पड़ोसन, नुक्कड़ जैसे सीरियलों का प्रसारण हुआ। फिर 23 अप्रैल 2000 का दिन आया जब इंडियन टेलीविजन में श्री अधिकारी ब्रदर्स द्वारा सब टी0वी0 नाम का चैनल आया जिसका उद्देश्य जनरल एंटरटेनमेण्ट रखा गया और 2003 में इसे सिर्फ कामेडी सेन्टरिक किया गया इसके बाद वर्ष 2005 में सोनी एंटरटेनमेण्ट द्वारा इसे अपने अधिकार में ले लिया गया और इसे यूथ सेन्टरिक कर दिया गया लेकिन फिर चैनल ने अपनी पॉलिसी बदली और पुनः इसे कॉमेडी सेन्टरिक कर दिया गया। यह सब इसीलिये कि शायद कॉमेडी से ही वो अपना चैनल चला सकते हैं।
इस चैनल ने ऑफिस- ऑफिस, साराभाई वर्सेस साराभाई, खिचड़ी, एफ आई आर, तारक मेहता का उल्टा चश्मा जैसे कॉमेडी सीरियल दर्शकों को दिये। धीरे-धीरे कॉमेडी का ट्रेण्ड भी चेंज शुरू हुआ और आपने अपने टी0वी0 स्क्रीन के विभिन्न एंटरटेनमेण्ट चैनल्स पर तरह-तरह के स्टैण्ड-अप-कमेडियन्स भी देखे जिनमें राजू श्रीवास्तव को बहुत पहचान मिली।
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बीसवी सदी की शुरूआत में कॉमेडी या जोक्स के द्वारा ही सन्ता बन्ता डॉट कॉम ने सन्ता बन्ता नाम से जोक निकालने शुरू किये जिसका उद्देश्य भी रूपये कमाना ही है। खैर यह एक दूसरी बात थी क्योंकि कहीं न कहीं  पगड़ी पहने हुए सन्ता बन्ता के जोक्स ने आपको हंसाने की कोशिश जरूर की है चाहे वे आपके मोबाइल के इनबाक्स में हो या ईमेल में।
यह तो बात थी मोबाइल जोक्स पर हंसाने की बात और फिर टी0वी0 की बात करते है। अब तो टी0 वी0 पर द्विअर्थी बातों को कहने वाली काॅमेडी दर्शकों के सामने प्रस्तुत की जा रही है जिसमें यह भी निर्णय लिया जाता है कौन कमेडियन कितना हंसा पाया और उसमें बेवजह बातों पर ठहाके लगाने वाले जजेस भी होते है, जिसे देखकर दर्शको को यह समझ में नही आता कि किसे देखकर हंसा जाए उस स्टैण्ड-अप-कमेडियन की द्विअर्थी बातों पर या उस जज पर जिसे शायद हंसने के लिए ही पैसे दिये गये हैं क्योकि निर्देशक भी बहुत समझदार है और वह जानता है कि अब दर्शक बैकग्राउंड में बजने वाली हंसी पर नही हंसता इसलिये जीते जागते जजेस के रूप में इन पुतलों के बिठाना पड़ता है। सब टी0 आर0 पी0 का ही खेल है।
डायरेक्टर तो जसपाल भट्टी भी थे पर उन्होंने कभी द्विअर्थी बातों को प्रस्तुत करने वाली काॅमेडी को दर्शकों के सामने नही परोसा और न ही वे टी0 आर0 पी0 के खेल में पड़े। अगर ऐसा होता तो शायद हम फ्लाप शो के और भी एपिसोड देख पाते जिसके एपिसोड्स की संख्या सिर्फ 10 ही है। उनके और भी अच्छे व स्वस्थ मनोरंजन आधारित सीरियल रहे है जैसे ‘उल्टा पुल्टा‘ ,‘नानसेन्स प्राइवेट लिमिटेड‘ आदि और उन्होंने विभिन्न फिल्मों में भी काम किया।
आजकल के काॅमेडी सीरियल्स व काॅमेडी मूवीज़ के निर्देशकों व कॉमेडी एक्टरर्स को जरूर उनसे सीखना चाहिए कि काॅमेडी बनती कैसे है और काॅमेडी में अभिनय कैसे किया जाता है जो कि शायद अब तक काॅमेडी का मायने ही द्विअर्थी समझते आये है। यह वास्तविक रूप में उन्हें दी हुयी श्रद्धांजलि होगी।

लगता है कि लखनऊ में हूं

जब भी कभी हॉस्टल में वार्डेन ने पुचकारा है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी कभी आउटिंग करने को गयी हूं,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी कभी शरारतों में मेरे फ्रैण्ड्स ने साथ दिया है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी कभी जींस-टॉप में शॉपिंग करने जाती हूं,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी कभी गुस्सा होने पर किसी ने मनाया है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी कभी माना है किसी ने मेरा कहना,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी किसी ने तहजी़बियत से ‘‘आप‘‘ कहा है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी किसी के बर्थडे पर किसी ने गाने की फरमाइश की है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।

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जब भी छोटे बच्चों के साथ उनके खेलों को खेलती हूं,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी किसी दिन देर तक सोयी हूं,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी सुबह मेरी फ्रैंण्ड ने प्यार से जगाया है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।  
जब भी शाम को पार्क में बैठती हूं,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।   
जब भी रास्ते पर चलते-चलते किसी की मिमिक्री की है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी कच्चे आम किसी के बैग से चुराकर खाये हैं,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी हद से ज्यादा गाने पर किसी ने टोका है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।
जब भी कभी मूवी देखने पर हूटिंग की है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।  
जब कभी गंगा के घाटों ने गोमती का किनारा दिया है,
तो लगता है कि लखनऊ में हूं।